अक्सर हम छोटी-छोटी परेशानियों पर हार मान लेते हैं। “मेरे पास अच्छी कोचिंग नहीं है,” या “घर के काम से टाइम नहीं मिलता।”
लेकिन आज हम आपको राजस्थान के सीकर के रहने वाले शंकर सैनी (Shankar Saini) की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर आप अपनी सारी शिकायतों को भूल जाएंगे। यह कहानी सिर्फ एक नौकरी पाने की नहीं, बल्कि हालातों से लड़कर जीतने की है।
बचपन, जो आंसुओं में बीता
शंकर का बचपन आम बच्चों जैसा नहीं था। जब वो सिर्फ 4 साल के थे, तो सिर से माँ का साया उठ गया। और अभी इस दुख से संभले भी नहीं थे कि 12 साल की उम्र में पिता भी चल बसे।
जिस उम्र में बच्चे खिलौनों के लिए रोते हैं, उस उम्र में शंकर को जिंदगी की कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा। लेकिन कहते हैं न, “जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता है।” शंकर को उनके दादा-दादी ने संभाला।
शंकर बताते हैं, “पापा के जाने के बाद मैंने खुद ही घर का काम संभाला। खाना बनाना, कपड़े धोना… सब कुछ खुद सीखा। दादा-दादी ने मुझे कभी पढ़ाई से नहीं रोका, बस यही कहते थे—बेटा तू पढ़, हम देख लेंगे।”
Army का सपना टूटा, तो नई राह चुनी
शंकर शुरू में Indian Army में जाना चाहते थे। खूब दौड़ लगाई, मेहनत की। लेकिन जब ‘अग्निवीर’ योजना आई और कुछ बदलाव हुए, तो उनका आर्मी का सपना थोड़ा डगमगा गया।
लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्हें पता चला कि Delhi Police का सिलेबस आर्मी जैसा ही है। बस फिर क्या था! शंकर ने अपनी दिशा बदली और Rojgar with Ankit (RWA) और Rahul Tevatia Sir की ऑनलाइन क्लासेज से जुड़ गए।
Maths से डर लगता था, उसी को हथियार बनाया
शंकर का गणित (Maths) बहुत कमजोर था। लेकिन उन्होंने राहुल तेवतिया सर की मैराथन क्लासेज देखीं। शंकर कहते हैं, “जब टीचर हमारे लिए 12-12 घंटे खड़े होकर पढ़ा सकते हैं, तो क्या हम अपने भविष्य के लिए पढ़ नहीं सकते?”
उन्होंने कसम खा ली कि जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं। प्रैक्टिस सेट्स लगाए, रात-रात भर पढ़ाई की और आखिरकार Delhi Police का एग्जाम क्रैक कर दिया।
वो वीडियो कॉल और दादा-दादी के आँसू…
ट्रेनिंग पूरी होने के बाद जब शंकर को पहली बार खाकी वर्दी मिली, तो वो पल उनके जीवन का सबसे भारी और सबसे खूबसूरत पल था।
उन्होंने वर्दी पहनकर सबसे पहले अपने घर वीडियो कॉल किया। स्क्रीन पर अपने पोते को पुलिस की वर्दी में देखकर वो बूढ़े दादा-दादी, जिन्होंने उसे पालने के लिए अपनी बुढ़ापे की लाठी घिस दी थी, फूट-फूट कर रो पड़े। वो आँसू दुख के नहीं, गर्व (Pride) के थे।
शंकर कहते हैं, “उनको खुश देखकर लगा कि मैंने उनके हर बलिदान का कर्ज चुका दिया।”
छात्रों के लिए शंकर का संदेश (Message for Aspirants)
- बहाने मत बनाओ: अगर माता-पिता नहीं हैं, घर में काम है, फिर भी शंकर कर सकते हैं, तो आप क्यों नहीं?
- शिक्षक पर भरोसा रखो: 10 जगह भटकने से अच्छा है, एक टीचर को पकड़ो और उसे फॉलो करो।
- खुद पर विश्वास: हालात चाहे जो हों, आपकी मेहनत एक दिन शोर जरूर मचाएगी।
निष्कर्ष: शंकर सैनी की कहानी साबित करती है कि मजबूरी नाम नहीं, बल्कि मजबूती का दूसरा नाम है। अगर हौसले बुलंद हों, तो अनाथ बच्चा भी अफसर बन सकता है।
📢 क्या आपकी भी ऐसी कोई संघर्ष की कहानी है? या आप किसी ऐसे छात्र को जानते हैं? कमेंट में जरूर बताएं, हम आपकी कहानी दुनिया तक पहुँचाएंगे!
Dr. Roman Saini
Roman Saini Success Story: 16 में डॉक्टर, 22 में कलेक्टर, और फिर… एक फैसले ने बदल दी भारत की शिक्षा व्यवस्था!
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