🔥 VIRAL NEWS: संसद भवन में गूंजा युवाओं का दर्द
करोड़ों बेरोजगारों के सीने में जो आग सुलग रही थी, वो अब राज्यसभा की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी है।
क्या आपने भी कभी किसी सरकारी नौकरी का फॉर्म भरने के लिए अपने दोस्तों या माता-पिता से पैसे उधार लिए हैं? क्या आपने भी जनरल डिब्बे में धक्के खाकर परीक्षा देने के बाद घर लौटते ही ‘पेपर लीक’ की मनहूस खबर सुनी है? अगर हाँ, तो यह खबर सीधे आपके दिल की आवाज़ है!
“जब सरकारें नौकरी की गारंटी नहीं दे सकतीं, जब सिस्टम एक पारदर्शी परीक्षा तक नहीं करवा सकता, तो फिर बेरोजगारों से फॉर्म के नाम पर इतनी भारी-भरकम फीस क्यों वसूली जाती है?”
देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं का दर्द अब सीधे संसद भवन (Rajya Sabha) में गूंजा है। युवाओं की बेबसी को समझते हुए आम आदमी पार्टी (AAP) के युवा सांसद राघव चड्ढा (Raghav Chadha) ने संसद में एक ऐसी हुंकार भरी है जिसने पूरे सिस्टम की नींद उड़ा दी है। उन्होंने साफ शब्दों में युवाओं की उस मांग को सदन के पटल पर रखा, जिसका सार एक ही है— “नौकरी नहीं तो फीस वापस!”
💸 फॉर्म के नाम पर ‘लूट’ और बेरोजगारों का दर्द
आज के समय में एक बेरोजगार छात्र 500 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक सिर्फ एक फॉर्म भरने की फीस देता है। इसके बाद महंगी कोचिंग की फीस, छोटे से किराए के कमरे का खर्च और परीक्षा केंद्र तक जाने का ट्रेन का टिकट! और अंत में उस छात्र को क्या मिलता है? या तो पेपर लीक, या फिर सालों-साल कोर्ट के चक्कर काटती भर्तियां।
सरकारें और एजेंसियां फॉर्म के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये कमा लेती हैं, लेकिन युवा वहीं का वहीं खाली हाथ खड़ा रह जाता है।
सरकारें और एजेंसियां फॉर्म के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये कमा लेती हैं, लेकिन युवा वहीं का वहीं खाली हाथ खड़ा रह जाता है।
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“ये मांग नहीं, हमारा हक़ है! अगर तय समय पर भर्ती पूरी नहीं होती, अगर सिस्टम की नाकामी से पेपर लीक होता है या परीक्षा रद्द होती है, तो छात्रों की पाई-पाई (फॉर्म फीस और खर्च) वापस होनी चाहिए। यह कोई खैरात नहीं है, यह उन बेरोजगारों का पैसा है जो उन्होंने अपना पेट काटकर भरा था।”
✈️ ‘डंकी रूट’ (Dunki Route) और डिप्रेशन का कड़वा सच
राघव चड्ढा ने संसद में भारत के युवाओं की बेबसी का जिक्र करते हुए ‘डंकी रूट’ का कड़वा सच देश के सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज का युवा डिप्रेशन, एंग्जायटी और अनिश्चितता के इतने भयानक दौर से गुजर रहा है कि वह अपनी जान जोखिम में डालकर अवैध तरीके से विदेश भागने को मजबूर है।
एक छात्र जो दिन-रात लाइब्रेरी में किताबें छानता है, वो सिर्फ एक ‘फेयर चांस’ मांग रहा है। इंग्लैंड जैसा टैक्स देकर सोमालिया जैसी सुविधाएं मिलने का ताना मारते हुए यह साफ कर दिया गया है कि इस देश का युवा अब और बेवकूफ नहीं बनेगा।
एक छात्र जो दिन-रात लाइब्रेरी में किताबें छानता है, वो सिर्फ एक ‘फेयर चांस’ मांग रहा है। इंग्लैंड जैसा टैक्स देकर सोमालिया जैसी सुविधाएं मिलने का ताना मारते हुए यह साफ कर दिया गया है कि इस देश का युवा अब और बेवकूफ नहीं बनेगा।
📢 क्या आप इस मांग से सहमत हैं?
क्या सच में ‘नौकरी नहीं तो फीस वापस’ का कानून इस देश में सख्ती से लागू होना चाहिए? अगर आपके सीने में भी एक बेरोजगार का दर्द है, तो इस आवाज़ को दबने मत दीजिए। इसे हर उस छात्र, हर उस दोस्त तक पहुंचाइए जो आज भी लाइब्रेरी में बैठकर अपने सुनहरे कल का इंतज़ार कर रहा है!
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